Horticulture Guruji
आम
फलों का राजा/ बाथरूम फ्रूट / भारत का राष्ट्रीय फल
- वानस्पतिक नाम – मंगिफेरा इंडिया
- कुल- एनाकार्डिएसी
- गुणसूत्र संख्या – 40=2n एलो-टेट्राप्लोइड/एम्फिडिप्लोइड
- उत्पत्ति – इंडो-बर्मा
- खाने योग्य भाग – मध्य फल भित्ति (mesocarp)
- फल का प्रकार – ड्रूप/स्टोन
- आम क्लाइमेक्टेरिक (climacteric) फल है
- आम सदाबहार (evergreen) फलदार पौधा है
- आम पुराने मौसम की वृद्धि पर अंतत: फल देता है
- परिपक्व और पके फल में 6 से 19% स्टार्च होता है
- परिपक्व फल में 7 से 0.05% अम्लता होती है
- पके फल में 22-28mg/100gm एस्कॉर्बिक एसिड होता है
- विभिन्न किस्मों चौसा (3%) कृष्णभोग (91.4%), लंगड़ा (90.8%), और दशहरी (93.2-94%) में व्यवहार्य पराग (viable pollen) प्रतिशत होता है
- वर्तिकाग्र की ग्रहणशीलता पुष्पन (anthesis) के लगभग 72 घंटों तक जारी रहती है
- फूल का प्रकार – पेनिकल (Penicle)
- अल्फांसो में पूर्ण फूल 6 से 11% होते है (लंगड़ा में सबसे ज्यादा पूर्ण फूल 9% सबसे कम रुमानी – 0.74%)।
Watch Lecture Video Part Ist
Watch Lecture Video Part IInd
- लिंगानुपात (उभयलिंगी (hermaphrodite) से नर फूल) 8 से 24.2% होता है
- आम लवण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है
- आम में स्पोरोफाइटिक स्व-असंगतता पाई जाती है
- आम का अधिकतम क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश और उत्पादन और उत्पादकता मध्यप्रदेश की है
- कटाई का समय मार्च से मध्य अगस्त तक
- उपज – 8.0 टन/हेक्टेयर
- आम को 8-9°C तापमान पर संग्रहित किया जाना चाहिए
- भारत आम का सबसे बड़ा उत्पादक देश है
- आम में फूल की कली में विभेदन अक्टूबर-दिसंबर में (किन्तु दशहरी में मई-जून और सितम्बर-अक्टूबर में)
- आम का मालफॉर्मेशन पहली बार 1891 में बिहार में देखा गया था
- आम की किस्म मुल्गोआ (Mulgoa) भारत में एकल-भ्रूण और फ्लोरिडा में बहु-भ्रूणीय है।
- विश्व के लगभग 39% आम का उत्पादन भारत में होता है।
- विश्व में सर्वाधिक उत्पादकता – वेनेजुएला।
- उत्तर भारतीय किस्में– एकांतर फलन, एकल भ्रूणता (मोनोएम्ब्रायोनिक), स्व-असंगतता।
- दक्षिण भारतीय किस्में- नियमित फलित, बहुभ्रूणता (पॉलीएम्ब्रायोनिक)
- परागकणकर्ता – घरेलू मक्खी।
- सर्वोत्तम पोलेनाइज़र किस्म बॉम्बे ग्रीन में सबसे अधिक विटामिन-सी होता है।
- परिपक्वता सूचकांक – अल्फांसो – विशिष्ट गुरुत्व -1.01 से 1.02
- दशहरी – विशिष्ट गुरुत्व – 1.0
- VHT- (वाष्प ऊष्मा उपचार) फल मक्खियों और स्टोन वीविल के लिए।
- कन्याकुमारी (तमिलनाडु) में आम में दो फसल या दो बार फल लिए जाते है।
- 1911 में पुणे में बर्न्स और प्रयाग ने आम पर संकरण का काम शुरू किया।
- आम में प्रजनन की केजिंग तकनीक का प्रयोग डॉ. आर.एन. सिंह ने किया।
- चीमा और धानी ने पहली बार 1934 में स्पंजी ऊतक (Spongy Tissue) की खोज की थी।
- ब्लैक टिप को पहली बार 1909 में वुडहाउस ने देखा था।
- आम की सबसे मीठी किस्म चौसा है।
- रुमानी सेब के आकार की किस्म है।
- बीज रहित किस्म – सिंधु = रत्ना X अल्फांसो, गुठली कुल फल वजन का 3%, गुठली का वजन 75 ग्राम। गुद्दा 83% गुद्दे से गुठली का अनुपात 26:1, जो स्टेनोस्पर्मोकार्पिक पार्थेनोकार्पी से उत्पन्न होता है।
- आम के बीजों की आयु 30 दिन (4 सप्ताह) होती है
- आम की अच्छी किस्म में 20° ब्रिक्स का टीएसएस (जेवियर-उच्चतम टीएसएस- 8° ब्रिक्स) होता है।
- मूलवृन्त
भारतीय बहुभ्रूण मूलवृन्त – बप्पाकाई, चंद्रकरन, गोवा, ओलौर, कुरुक्कन, सोलन, मुलगोआ, बेल्लारी, विलियाकोलुम्बन, नीलेशवर ड्वार्फ।
विदेशी बहुभ्रूण मूलवृन्त – एप्रीकॉट, साइमंड्स, हिग्स, पिको, साबरी, स्ट्रॉबेरी, कंबोडिया, टेरपेन्टाइन, काराबाओ, साइगॉन।
लवण प्रतिरोधी मूलवृन्त – कुरुक्कन, मूवंदन, नेक्कारे।
- दशहरी में बौने प्रभाव के लिए रुमानी का प्रयोग किया जाता है।
- लंगड़ा या हिमसागर में बौने प्रभाव के लिए ओलौर का प्रयोग किया जाता है।
- अल्फांसो में बौने प्रभाव के लिए वेलाइकोलम्बन का प्रयोग किया जाता है।
जलवायु
- आम उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छी तरह से फलता है।
- इसे समुद्र तल से लगभग 1400 मीटर की ऊंचाई तक उगाया जा सकता है।
- इष्टतम तापमान सीमा 24°C से 27°C है। हालांकि, यह नियमित सिंचाई के साथ फलों के विकास के दौरान 48°C तक के तापमान को सहन कर सकता है, जिससे फलों के आकार, गुणवत्ता और परिपक्वता में सुधार होता है। कम तापमान (13°C-19°C) फूल की कली के विभेदन के लिए अच्छा होता हैं।
- इसे 25 सेमी से 250 सेमी तक वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है फूल आने से 2-3 महीने पहले यदि उच्च आर्द्रता, पानी की कमी या पौधा आराम की स्थिति में होता है तो फूलों की कली के गठन में सुधार होता है।
मिट्टी
- आम अच्छी गहराई (180सेमी) और जल निकासी वाली सभी मिट्टी में उगता है, काली कपासिय मिट्टी को छोड़कर।
- इष्टतम पीएच 5.5 से 7.0 है।
- जलोढ़ और लैटेराइटिक मिट्टी अच्छी होती है।
- यह लवणीय स्थितियों को सहन नहीं कर सकता है।
किस्में
चौसा, दशहरी, गद्दामार, ओट्टू मंगई, मुलगोबा, लंगड़ा, बनारसी, बादशाहपासंद, सुरखा, तोतापुरी, फजली, हुसनारा, अल्फांसो, आम्रपाली, बादामी, बंगलोरा, बंगनापल्ली, बॉम्बे ग्रीन, चेरुकु रसालु, चिन्ना रसालू, पेड्डा रसालू, रुमानी, फजली कलां, फर्नांडियन, गुलाबखास, हिमायत, हिमसागर, इमाम पसंद, जहांगीर, कलामी, केसर, किशन भोग, कोमंगा, लालबाग, लंगड़ा, मालदह, मालगिस, मल्लिका, मंकुर (गोवा), मनकुराड, मूववंदन, नटुमा , नीलम, पैरी, प्रियोर, राजापुरी, रसपुरी, रत्ना, सफेदा, समर बहिश्त, सुवर्णरेखा, तोतापुरी, वनराज, जरदालु, आलमपुर बनाशन, पुलियान, कुट्टियट्टोर, इला मंगा, नन्नारी।
- उत्तर भारतीय किस्में – दशहरी, लगरा, चौसा, बॉम्बे ग्रीन
- दक्षिण भारतीय किस्में- बंगलोरा, नीलम, स्वर्णरेखा, पैरी, बंगनपाली, मुलगोवा, बादामी।
- पूर्वी भारत- हिमसागर, फजली, जर्दालु, कृष्णभोग, गुलाबखास।
- पश्चिम भारत – अल्फासो, पैरी, केसर, राजापुरी, मुल्कुराद, जमादार।
लोकप्रिय किस्में-
- अल्फांसो: स्पंजी ऊतक के लिए अतिसंवेदनशील भारत की सबसे लोकप्रिय किस्म। इसमें निर्यात गुणवत्ता है।
- बंगनपल्ली: आंध्र प्रदेश की मुख्य व्यावसायिक किस्म।
- बॉम्बे ग्रीन: उत्तर भारत की सबसे पुरानी किस्म। यूपी में इसे मालदा और दिल्ली में सहरोली कहते हैं।
- चौसा : आम की सबसे मीठी किस्म
- दशहरी: उत्तर भारत की सबसे लोकप्रिय किस्म।
- फाजली: देर से पकने वाली किस्म।
- केसर: इसकी प्रसंस्करण गुणवत्ता अच्छी होती है।
- लंगड़ा: इसमें विशेष तारपीन का स्वाद होता है, फल गिरने की संभावना सबसे अधिक होती है।
- निरंजन : असमय फलन।
- नीलम: यह सर्वोत्तम संयोजी किस्म है। लंबे परिवहन के लिए आदर्श, एक वर्ष में दो फसलें।
- रोजिका: आम की उत्परिवर्ती किस्म।
- मधुलिका: आम की सबसे जल्दी पकने वाली किस्म।
- लाल सिंधूरी: आम की पाउडरी मिल्ड्यू प्रतिरोधी किस्म
- रुमानी- सेब के आकार की किस्म।
- अक्षय : दशहरी से चयन
- नियमित फल देने वाली किस्में: नीलम, गुलाबकास, हिमसागर, पैरी, तोतापुरी।
- बेमौसम फलन वाली: निरंजन, मधुलिका।
- विदेशी रंग की किस्में: टॉमी अटकिन्स, ज़िलेट, हैडेन, सेंसेशन, जूली
- मुलगोआ आम की सभी रंगीन किस्मों की जननी है और मुरब्बा बनाने के लिए उपयोगी है।
संकर किस्में
- मल्लिका: नीलम x दशहरी – नियमित फलन, उच्चतम विटामिन ए
- अमरपाली: दशहरी x नीलम, बौनी, HDP के लिए उपयुक्त (5X2.5m2)
- रत्न: नीलम x अल्फांसो, नियमित फलन, स्पंजी टिश्यू फ्री, गुद्दा -78.62%।
- सिंधु: रत्ना x अल्फांसो
- अर्का पुनीत: अल्फांसो x बंगनपल्ली, स्पंजी टिश्यू फ्री
- अर्का अरुणा: बंगनपल्ली x अल्फांसो, बौनी, स्पंजी टिश्यू फ्री
- अर्का अनमोल: अल्फांसो x जनार्दन पसंद, स्पंजी टिश्यू फ्री
- अर्का नीलकिरण: अल्फांसो x नीलम, स्पंजी टिश्यू फ्री
- मंजीरा: रुमानी x नीलम
- प्रभा शंकर: बॉम्बे ग्रीन x कलापडी
- पूसा सूर्य
- पूसा अरुमिना: आम्रपल्ली x सेंसेशन (यूएसए)
- साईसुगर्था: तोतापुरी X केसर, नियमित फलन, मलफोर्मेशन मुक्त, लुगदी के लिए उपयुक्त।
- अरुणिका: सीआईएसएच, लखनऊ, आकार में आम्रपाली से 40% छोटे, आकर्षक लाल रंग का फल।
- अंबिका: सीआईएसएच, लखनऊ
प्रवर्धन
आम का व्यावसायिक प्रवर्धन किया जाता है
- विनियर ग्राफ्टिंग
- अप्रोच ग्राफ्टिंग
- सॉफ्ट वुड ग्राफ्टिंग
- ग्राफ्टिंग के लिए जून से सितंबर/अक्टूबर का समय सबसे अच्छा रहता है। एक समान मूलवृन्त तैयार करने में बहुभ्रूण पौध सर्वोत्तम रहती हैं।
- तोतापुरी लाल तथा ओलोर बौने मूलवृंत होते हैं। विभिन्न मूलवृंतों पर आम में कोई विशेष भिन्नता नहीं दिखाई देती है।
भूमि की तैयारी और रोपण
- जमीन की उचित जुताई करनी चाहिए। 8-10 मीटर की दूरी पर 90 x 90 x 90 सेमी के गड्ढे खोदे जाते हैं। गड्ढों को FYM से भरा जाता है।
- रोपण बरसात के मौसम में किया जाता है ग्राफ्ट यूनियन को रोपण के समय मिट्टी से कम से कम 6 इंच ऊपर रखना चाहिए। पौधे को सहारा (staking) देना चाहिए और रोपण के तुरंत बाद पानी देना चाहिए।
- अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों को समायोजित करने के लिए और पेड़ों के सीधे संरेखण को सुनिश्चित करने के लिए, वांछित रोपण प्रणाली जैसे वर्गकार, पंचभुजाकर, या त्रिकोणीय प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
खाद और उर्वरक
- उर्वरकों का प्रयोग वर्ष में दो बार किया जाता है अर्थात मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) और मानसून के बाद की अवधि (सितंबर-अक्टूबर) के दौरान।
- 10 किग्रा गोबर खाद, 2.5 किग्रा हड्डी का चुरा, 1.0 किग्रा पॉट सल्फेट 1 वर्ष के पौधे के लिए और 10 वर्ष तक प्रति वर्ष 5 किग्रा गोबर खाद, 0.5 किग्रा हड्डी का चुरा और 4 किग्रा पॉट सल्फेट प्रति वर्ष बढ़ाया जाता है।
- फल देने वाले पेड़ों को 750 ग्राम N, 200 ग्राम P2O5 और 700 ग्राम K2O/वर्ष/पेड़ दिया जाता है। जैविक खाद का प्रयोग हमेशा अक्टूबर के दौरान करना बेहतर होता है।
- खाद को तने से ड्रिप लाइन तक लगभग 5-2 मीटर की दूरी पर खोदी गई एक छोटी खाई में डाला जाना चाहिए।
- वर्षा न होने पर शीघ्र ही सिंचाई कर देनी चाहिए।
सिंचाई
- सिंचाई मिट्टी और मौसम की स्थिति के अनुसार होनी चाहिए।
- फल देने वाले वृक्षों को फल बनने से लेकर पकने तक 10-15 दिनों के अंतराल पर नियमित रूप से सिंचाई करनी चाहिए।
- अधिकतम फल कलियों के विकास के लिए फूल आने से कम से कम 2-3 महीने पहले सिंचाई बंद कर पौधे को आराम देना चाहिए।
- ड्रिप के तहत पौधों को 40 लीटर पानी प्रति पेड़ सप्ताह में दो बार लगाया जा सकता है।
अंतरशस्य कियांए
- खरपतवारों को नियंत्रण में रखने और कुछ अतिरिक्त आय प्राप्त करने के लिए फलन से पहले की अवधि में अंतरशस्य की जा सकती है।
- सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर फालसा, पपीता और अनानास या सब्जियां उगाई जा सकती हैं।
- आच्छादन फसलें जैसे जुट, ढैंचा, लोबिया, ग्वार फली आदि भी वर्षा ऋतु में उगाई जा सकती हैं और वर्षा समाप्त होने से पहले मिट्टी में जोत दी जाती हैं।
- वर्ष में दो बार जून और अक्टूबर में भूमि की जुताई करनी चाहिए।
खरपतवार प्रबंधन
- पेड़ों के जड़ क्षेत्र को हर समय खरपतवार मुक्त रखना चाहिए।
- हाथ से गुड़ाई करने की अनुशंसा नहीं की जाती है क्योंकि यह सक्रिय जड़ों को परेशान करेगी।
- भारी पलवार (mulching) के साथ खरपतवार नाशक खरपतवारों को नियंत्रित करने में काफी प्रभावी हो सकते हैं।
- अंकुरण से पहले (pre-emergence) 4 किग्रा/हेक्टेयर एट्राज़ीन/ऑक्सीफ्लोरोफेन (गोल) @ 800 मिली/हेक्टेयर और अंकुरण के बाद 2 लीटर/हेक्टेयर ग्रामाक्सोन (पैराक्वेट)/उपचार से खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।
छंटाई और संधाई
- मृत और रोगग्रस्त शाखाओं को हटाने के अलावा आम को नियमित छंटाई की आवश्यकता नहीं है।
- युवा पौधों (2-3 वर्ष की आयु) का अच्छा ढांचा तैयार करने के लिए संधाई की जानी चाहिए।
फूल आना और फल लगना
- फूल की कली का निर्माण फूल आने से 2-3 महीने पहले होता है।
- स्थान और किस्म के आधार पर नवंबर-दिसंबर से फरवरी-मार्च तक पुष्पन होता है और लगभग 2-3 सप्ताह तक जारी रहता है।
- फूल पॉलिगमस (polygamous) होते हैं-लिंग अनुपात को फूल की कली बनने की अवस्था में NAA 200ppm के प्रयोग से सुधारा जा सकता है।
आम की तुड़ाई और उपज
तुड़ाई का चरण बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिसे लिए निम्न संकेतों पर तुड़ाई की जाती है
(1) रंग विकास की शुरुआत
(2) पौधे से एक या दो फलों का गिरना
(3) विशिष्ट गुरुत्व 1.0 से 1.02 (अधिक विश्वसनीय)
- आम को सामान्यत फल बनने से लेकर पकने तक 90-120 दिन लगते हैं। फलों को कोई नुकसान पहुंचाए बिना पोल हार्वेस्टर का उपयोग करके तुड़ाई की जाती है।
- ग्राफ्टेड़ पौधे लगभग 2-3 वर्षों में फल देने लगते हैं, लेकिन व्यावसायिक उपज 8-10 वर्षों में प्राप्त की जा सकती है और 40-60 वर्षों तक जारी रह सकती है।
- औसत उपज 8-10 टन/हेक्टेयर है और किस्म और स्थान के अनुसार भिन्न हो सकती है।
पैकिंग और परिवहन
- आम को आम तौर पर पैडिंग सामग्री के रूप में पुआल का उपयोग करके बांस की टोकरियों में पैक किया जाता है।
- लकड़ी और कार्ड बोर्ड के बक्सों का भी उपयोग किया जाता है। फलों को अलग-अलग लपेटने से फलों की गुणवत्ता बनी रहती है।
- गर्म पानी के उपचार के साथ 3% वैक्सिंग से भंडारण जीवन में सुधार होता है। किस्म के आधार पर आमों को 5-14°C और 90% अपेक्षित आद्रता पर लगभग 2-7 सप्ताह तक संग्रहीत किया जा सकता है।
शारीरिक विकार
1. आम की मालफोर्मेशन
- मारिस 1891 में दरभंगा (बिहार) भारत में आम मालफॉर्मेशन रोग का निरीक्षण करने वाले पहले वैज्ञानिक थे।
- प्रभावित किस्में – बॉम्बी ग्रीन, चौसा, और दशहरी, लंगड़ा।
- दक्षिण की अपेक्षा उत्तर में विकृति गंभीर है। इससे कुल फसल का लगभग 50-60% नुकसान हो सकता है। कृष्णभोग, कलेक्टर, लंगड़ा, नीलम सहिष्णु किस्में हैं।
दो प्रकार की मालफॉर्मेशन
A) वनस्पति मालफॉर्मेशन
- वानस्पतिक मालफॉर्मेशन आम तौर पर युवा पौधों की शाखाओं को प्रभावित करती है जिसमें कलीयां फूल जाती है और शीर्ष छोर पर छोटे इंटरनोड्स के साथ छोटी शाखाएं बनती हैं और पौधा को संरचना में ‘चुड़ैल के झाड़ू’ का रूप दे देती हैं।
B) पुष्प मालफॉर्मेशन
- पुष्प मालफॉर्मेशन में पुष्पगुच्छ विकृत हो जाते हैं, एक्सेस (axes) विकृत हो जाती हैं, एक्सेस छोटी हो जाती हैं और रचिस (rachis) मोटे हो जाते है इससे पुष्पक्रम गुच्छे की तरह हो जाते हैं।
- विकृत पुष्पगुच्छ में सामान्य फूलों की तुलना में बड़े फूल होते हैं और अधिकतर नर होते हैं।
मालफॉर्मेशन के कारण
- फफूंद (फुजैरियम मैनिलिफॉर्मे)
- रोग वाहक मैंगो हॉपर को माना जाता है।
- एक्रोलॉजिकल (माइट्स की कई प्रजातियां (एकेरिया मैंगिफेरा, चेलेटोजेनस ऑर्नाटस, टायफालोडुओमस रेडेनस)
- शारीरिक और जैव रासायनिक कारण (पोषण, मिट्टी की नमी, हार्मोनल संतुलन, अवरोधक आदि)
नियंत्रण के उपाय
- पौधे पर विकास नियामकों (अक्टूबर के पहले सप्ताह) और फेनोलिक यौगिकों (NAA @ 200ppm, Ethrel, GA, Paclobutrozol, आदि) का अनुप्रयोग।
- प्रतिपक्षी और एंटीमालफॉर्मिन का उपयोग: ग्लूटाथीयोन, एस्कॉर्बिक एसिड, सिल्वर नाइट्रेट
- पोषक तत्वों का अनुप्रयोग: अधिक NPK के साथ FeSO4, और कोबाल्ट
- अटैचमेंट के बिंदु से 15-20 सेमी नीचे विकृत भागों की छंटाई करें और फिर कैप्टान 2% + एकार 0.1% या मैलाथियान 0.1% के मिश्रण से पौधों को स्प्रे करें।
- कीटनाशकों का प्रयोग: पैराथियान, केलथेन, केराथेन।
- पुष्पगुच्छ के चारों ओर तापमान बढ़ाने के लिए पुष्पगुच्छों को पॉलिथीन फिल्म से ढकना।
2. फल गिरना
फलों का गिरना स्वाभाविक है और आम में विशेष रूप से सरसों और मटर के दानों वाली अवस्था (पहले चार सप्ताह) के दौरान बहुत अधिक होता है।
फलों के गिरने के कारण
- परागण की कमी
- कम वर्तिकाग्र ग्रहणशीलता
- दोषपूर्ण पूर्ण फूल
- अपर्याप्त परागणकर्ता, बारिश या उच्च आर्द्रता और बादलों वाले मौसम के कारण खराब पराग स्थानान्तरण।
- मिट्टी में नमी की कमी
- प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियां जैसे उच्च तापमान, हवा, ओलावृष्टि आदि।
- चूर्णी फफूंदी, एन्थ्रेक्नोज़ जैसे रोगों के कारण।
- ऑक्सिन, GA3 और साइटोकिनिन की कमी।
नियंत्रण के उपाय
- फल बनने से लेकर विकास अवस्था तक नियमित सिंचाई।
- मटर के दाने की अवस्था के दौरान 25 पीपीएम NAA या 2,4-डी 10-15 पीपीएम, 2,4,5-टी 20 पीपीएम जैसे PGR का अनुप्रयोग।
- यूरिया (2%) का छिड़काव भी लाभकारी होता है।
2. द्विवार्षिक फलन/एकान्तर फलन
- द्विवार्षिक फलन को एकान्तर फलन के रूप में भी जाना जाता है। यह एकान्तर वर्ष में उपज भिन्नता को इंगित करता है, यानी इष्टतम या भारी फलने वाले वर्ष के बाद कम या कोई फल नहीं देने वाला वर्ष होता है।
- ‘ऑन’ ईयर और ‘ऑफ ईयर’ वाक्यांशों का उपयोग क्रमशः ‘सामान्य’ और ‘उप-सामान्य’ या ‘कोई फसल नहीं’ के वर्षों को संदर्भित करने के लिए किया जाता है।
- हालांकि नियमित फल प्राप्त करने के लिए आम्रपाली जैसी नियमित फल देने वाली किस्मों के रोपण का सुझाव दिया जाता है, लेकिन उत्तर भारत में व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली अधिकांश किस्में, जैसे दशहरी, सफेदा, चौसा और लंगड़ा एकान्तर फलन वाली हैं।
कारण: –
A) जलवायु परिस्थितियाँ: – प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियाँ एक ‘ऑन’ वर्ष को ‘ऑफ’ वर्षों में बदल देती हैं। प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियाँ उच्च तापमान, बहुत कम तापमान, पाला, तेज़ हवा, ओलावृष्टि हैं।
B) शाखाओं की आयु और आकार: – ऑन’ वर्ष में किसी भी आकार या परिपक्वता की शाखा फूल की कलियों को भिवेदित करती हैं जबकि ऑफ वर्ष में परिपक्वता शाखाएं भी फूलने में विफल रहती हैं।
C) C/N अनुपात: – C/N अनुपात पुष्पन के लिए जिम्मेदार पदार्थों के संश्लेषण और क्रिया के लिए अनुकूल परिस्थितियों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
D) हार्मोनल संतुलन: – ऑक्सिन और अवरोधक जैसे पदार्थ के उच्च स्तर और जिबरेलिन जैसे पदार्थों के निम्न स्तर को फूल वाली टहनियों के लिए महत्वपूर्ण पाया गया।
नियंत्रण के उपाय:
- बगीचों का उचित और वैज्ञानिक रखरखाव
- ऑन वर्ष में विरलीकरण (thinning) (NAA)
- रासायनिक नियंत्रण जैसे एथरेल (2-क्लोरोएथेन फॉस्फोनिक एसिड) पैक्लोबुट्राज़ोल (10 ग्राम/पेड़), 1-2% KNO3, 6-8% कैल्शियम नाइट्रेट आदि का छिड़काव।
- छंटाई: फलदार टहनियों की छंटाई करना और पेड़ के शीर्ष को ठीक से खोलना
- नियमित फल देने वाली किस्में उगाना: बैंगलोर, रुमानी, नीलम और लगभग सभी संकर।
3. काला सिरा
- उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार और पश्चिम बंगाल में बहुत ही सामान्य।
- शारीरिक विकार के कारण फल का दूरस्थ सिरा काला कठोर हो जाता है।
- फल समय से पहले पक जाते हैं।
कारण
- जहां आम के बगीचे के पास ईंट के भट्ठे स्थित हों।
- ईंट भट्ठे के धुएं, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, एसिटिलीन से प्रदूषित वातावरण इस विकार का कारण बनता है।
नियंत्रण के उपाय
- आम के बगीचे की पूर्व और पश्चिम में कम से कम 6 किमी और उत्तर और दक्षिण में 0.8 किमी की दूरी ईंट भट्ठा से होनी चाहिए।
- चिमनी की ऊंचाई 15 से 18 मीटर बढ़ाएं।
- फल सेट के बाद 6 प्रतिशत बोरेक्स का छिड़काव 10-15 दिनों के अंतराल पर करने से यह (पंजाब, यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल) नियंत्रित होता है।
4. पत्ता झुलसा
- विशेष रूप से पुराने आम के पत्ते सिरों और किनारों पर झुलसे हुए दिखाई देते हैं।
- प्रभावित पत्तियाँ नीचे गिर जाती हैं और पेड़ की ताक़त और उपज कम हो जाती है।
कारण
- क्लोराइड आयनों की अधिकता जो पोटाश को अनुपलब्ध बनाती है।
- लवणीय मिट्टी में पत्ती झुलसना आम है
- जहां सिंचाई के लिए खारे पानी का उपयोग किया जाता है।
- या जहां पोटेशियम के लिए MOP (पोटेशियम क्लोराइड) का उपयोग किया जाता है।
नियंत्रण
- पोटेशियम सल्फेट उर्वरक का उपयोग करें।
- लवणीय मिट्टी में रोपण से बचें।
- सिंचाई के लिए खारे पानी से बचें।
5. स्पंजी ऊतक
- महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और आंध्र प्रदेश में अधिक गंभीर समस्या है।
- गुद्दा पकने के दौरान एक अ-खाद्य खट्टे पीले और स्पंज जैसे पैच के रूप में हवा की पॉकेट के साथ या उसके बिना रूपांतरित हो जाता है, यह पैच फल में छोटा सा या पुरे गूदे में बनता है।
- प्रभावित फलों में दुर्गंध आती है और वे कम गुणवत्ता के हो जाते हैं।
- अल्फांसो किस्म इस रोग के प्रति अधिक संवेदनशील होती है।
कारण
- उच्च तापमान,
- सौर विकिरण जो मिट्टी को अधिक गर्म रखता है और वह गर्मी जो मिट्टी द्वारा संवहन प्रवाह के रूप में उत्सर्जित होती है।
- कटाई के बाद सूरज की रोशनी के संपर्क में आना इसका कारण माना जाता है।
प्रबंधन
- सीमा पर लम्बे छायादार पौधों से आम के बाग की रक्षा करें।
- सोड कल्चर (Sod culture) का उपयोग करें
- बाग में धान की पराली से पलवार करना चाहिए।
- कैल्शियम क्लोराइड के 2% घोल में फलों की तुड़ाई से पहले डुबोना।
- पूर्ण परिपक्व फल की अपेक्षा 3/4 परिपक्वता अवस्था में फलों की तुड़ाई करें।
- 500 पीपीएम एथेफॉन से फलों को तुड़ाई के बाद उपचारित करना।
6. सॉफ्ट नोज
Ca की कमी के कारण होने वाला शारीरिक विकार पकने से पहले फल के शीर्ष की ओर गुदे के टूटने का कारण बनता है।
7. क्लस्टरिंग (झुमका)
- फरवरी-मार्च के दौरान प्रतिकूल मौसम (कम तापमान) के कारण पुष्प गुच्छों की नोक पर बिना वृद्धि वाले फलों का समूहन हो जाता है।
- सिकुड़े हुए और भ्रूण का गर्भपात होने से अधिकांश फल गिर जाते हैं।
कीट
- मैंगो हॉपर या जैसिड्स (अमृटोडस स्पीशीज)
- वयस्क और निम्फ दोनों कोमल प्ररोह की पत्तियों और पुष्पक्रम या पुष्पगुच्छ से रस चूसते हैं।
- पुष्पगुच्छ सूख जाते है।
- फुदके मधुरस का स्राव करते हैं जिस पर पत्तियों और पुष्पगुच्छों पर काली फफूंदी लग जाती है।
नियंत्रण
- कार्बेरिल (सेविन) 0.05% (2 ग्राम/लीटर) या मोनोक्रोटोफॉस 0.04% या फॉस्फैमिडोन (डाइमेक्रॉन) 0.05% का छिड़काव पेनिकल्स के निकलने के समय और फिर से मटर के दाने बनने की अवस्था में करें।
- मीली बग (ड्रोसिचा मैंगिफेरिया):- (आम का प्रमुख कीट) यह रस चूसते हैं और प्रभावित पौधे का हिस्सा सूख जाता है, और फलों के अपरिपक्व अवस्था में गिरने का कारण भी बनता है।
नियंत्रण
- तेज गर्मी के दौरान आम के तने के आसपास की मिट्टी खोदें और मानसून के बाद खरपतवार और अन्य घास को साफ करें।
- नवंबर-दिसंबर के महीने में तने की बैंडिंग अल्काथेन शीट (400 गेज) के फिसलन बैंड या 1:2 के अनुपात में ग्रीस और कोलतार के चिपचिपे बैंड (30-45 सेमी चौड़ाई के) से जमीनी स्तर से 30-40 सेमी ऊपर से करें।
- कार्बेरिल (सेविन) 2%, मोनोक्रोटोफॉस 0.4% का छिड़काव करें।
- फल मक्खी (डेकस डोरसेलिस):-
फल मक्खी का लार्वा लुगदी को खाता है और इसे एक बदबूदार सड़े हुए गाड़े द्रव में परिवर्तित करता है। संभोग के बाद मक्खियाँ पकने से ठीक पहले फल में त्वचा के नीचे 150-200 के गुच्छों में अंडे देती हैं। 2-3 दिनों के बाद लार्वा निकल आते हैं और गूदे को खाना शुरू कर देते हैं।
नियंत्रण
- गिरे हुए फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
- कार्बेरिल 2% + 0.1% गुड़ का छिड़काव ओविपोजिशन (oviposition) से पहले करें।
- आम के बाग में अप्रैल-जून से मिथाइल यूजेनॉल 1% मैलाथियान 0.1% के 100 मिली इमल्शन युक्त ट्रैप को लटकाना चाहिए।
4. गुठली या नट घुन:- (क्रायपोटोरिन्चस मैंगिफेरा और सी. ग्रेविस):-
- दक्षिण भारत में अधिक अधिक होती है।
- सूंडीऔर वयस्क फल के गूदे और बीजपत्र दोनों को खाते हैं।
- अंडे आंशिक रूप से विकसित फलों में दिए जाते हैं।
नियंत्रण
- आम के बाग में पादप स्वच्छता उपायों को अपनाएं।
- संक्रमित छाल को केरोसिन इमल्शन से धोएं।
- डायज़िनॉन (05%) का एक तने पर स्प्रे करें।
- मेलाथियान 1% + एल्ड्रिन 0.1% फूल आने के 45 दिन बाद छिड़काव करें और 30 दिनों के अंतराल पर तीन बार छिड़काव दोहराएं।
बीमारीयां
- चूर्णी फफूंदी (ओडियम मैंगिफ़ेरा)
- अनुकूल तापमान और आर्द्रता के कारण फरवरी-मार्च के दौरान अथवा इससे पहले से ही चूर्णी फफूंदी का प्रकोप हो सकता है। फूल, नए लगे फल पूरी तरह से एक सफेद पाउडर द्रव्यमान से ढके हो सकते हैं।
नियंत्रण
- 10 दिनों के अंतराल पर पौधे को वेटेबल सल्फर 2% या कैराथेन 0.1% या बाविस्टिन 0.1% के साथ स्प्रे करें।
- एन्थ्रेक्नोज (कोलेटोट्रिचम ग्लियोस्पोराइड्स)
- 24 से 32°C तापमान वाले नम और उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में गंभीर समस्या होती है।
- कारक कवक पत्ती धब्बा, बौर अंगमारी, मुरझाई नोक, टहनी झुलसा और फल सड़न के लक्षण पैदा करता है।
- नए फलों पर काले धब्बे पड़ जाते हैं, वे सिकुड़ कर गिर जाते हैं।
नियंत्रण
- मृत और सूखी टहनियों को काटकर जलाकर नष्ट कर दें।
- फरवरी, अप्रैल और सितंबर के महीने में बोर्डो मिश्रण (3:3:50) या ब्लिटॉक्स 3% या बाविस्टिन 0.1% का छिड़काव करें।
- प्रभावित फलों को भंडारण से पहले 15 मिनट के लिए 51°C गर्म पानी में डुबोया जाना चाहिए।
References cited
- Commercial Fruits. By S. P. Singh
- A text book on Pomology, Vol,1. by T. K. Chattapadhya
- Tropical Horticulture, Vol.1, by T. K. Bose, S. K. Mitra, A. A. Farooqui and M. K. Sadhu